गुरुवार 18 जून 2026 - 12:55
कर्बला के शहीदों की वफ़ादारी इंसानियत की तारीख़ का सबसे बड़ा करिश्मा है: हुज्जतुल इस्लाम अंसारियान

हौज़ा / ईरान के मशहूर आलिम ए दीन हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन हुसैन अंसारियान ने कहा है कि कर्बला के 72 शहीद ईमान अख़्लाक़ और अमल के उच्चतम मर्तबे के धारक थे। उन्होंने मैदान-ए-आशूरा में बंदगी-ए-इलाही की ऐसी बेमिसाल तस्वीर पेश की कि वह इंसानियत की तारीख़ के सबसे बड़े अजायबात में शुमार हो गई।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन हुसैन अंसारियान ने तेहरान में हुसैनिया-ए-हमदानीहा में मुहर्रम की पहली मजलिस से ख़िताब करते हुए सूरह-ए-कहफ़ में अस्हाब-ए-कहफ़ के वाक़िए का हवाला दिया और कहा कि क़ुरआन-ए-करीम में इरशाद होता है:
«أَمْ حَسِبْتَ أَنَّ أَصْحَابَ الْکَهْفِ وَالرَّقِیمِ کَانُوا مِنْ آیَاتِنَا عَجَبًا»
क्या तुमने यह गुमान किया कि अस्हाब-ए-कहफ़ हमारी अजीब निशानियों में से हैं?हालाँकि अल्लाह तआला की क़ुदरत के सामने यह कोई ग़ैर-मामूली बात नहीं कि कुछ लोगों को तीन सौ साल से ज़्यादा अरसे तक गुफ़ा में सुलाकर दोबारा बेदार कर दिया जाए।

उन्होंने कहा कि अल्लाह तआला की तख़्लीक़ में बेशुमार हैरत-अंगेज़ निशानियाँ मौजूद हैं, लेकिन कर्बला के 72 शहीद उन सबसे बड़े अजायबात में से हैं, जिनकी हक़ीक़त (सच्चाई) और अज़मत को इंसानी अक्ल पूरी तरह समझ नहीं सकती।

हुज्जतुल-इस्लाम अंसारियान ने सैय्यद मुर्तज़ा के कलाम का हवाला देते हुए कहा कि दुश्मनों ने शहदा-ए-कर्बला (कर्बला के शहीदों) के जिस्म  को तपती ज़मीन पर छोड़ दिया और उनके अहल-ए-बैत को तद्फ़ीन की इजाज़त तक न दी, लेकिन इन पाक रूहों को बारगाह-ए-इलाही (ईश्वर की दरगाह) में ऐसा मुक़ाम (स्थान) अता हुआ कि ख़ुद परवरदिगार-ए-आलम ने उनकी मेज़बानी का शरफ़ अपने ज़िम्मे ले लिया।

उन्होंने कहा कि दुश्मन यह समझ रहे थे कि शहीदों के जिस्मों के टुकड़े-टुकड़े करके और उन्हें सहरा में छोड़कर उनका नाम-ओ-निशान मिटा देंगे, लेकिन यही मज़ालिम उनकी अबदी इज़्ज़त और सरबुलंदी का सबब (कारण) बन गए और दुनिया व आख़िरत के अब्वाब-ए-ख़ैर (भलाई के दरवाज़े) उन पर खोल दिए गए।

उस्ताद-ए-हौज़ा-ए-इल्मिया ने कहा कि आज भी शहदा-ए-कर्बला की हक़ीक़ी अज़मत  पूरी तरह आश्कार नहीं हुई। इंसानी अक्ल उनके मुक़ाम व मर्तबे के तमाम पहलुओं का इहाता (समावेश) नहीं कर सकती और क़यामत तक भी उनकी हक़ीक़त पूरी तरह मुनकशिफ़ नहीं होगी।

उन्होंने हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अस्हाब (साथियों) की ख़ुसूसियात (विशेषताएँ) बयान करते हुए कहा कि वे कामिल-तरीन ईमान, बेहतरीन अख़्लाक़ और उच्चतम अमल के धारक थे। उनका ईमान ख़ुदा, क़यामत और अपने इमाम पर इस दर्जे (स्तर) पर मज़बूत था कि उन्होंने कभी भी ज़ाहिरी हालात को अपनी राह में रुकावट नहीं बनने दिया।

हुज्जतुल-इस्लाम अंसारियान ने कहा कि मदीना, मक्का, बसरा और कूफ़ा से इमाम हुसैन (अ) के क़ाफ़िले में शामिल होने वाले जाँ-निसारों ने आख़िरी लम्हे तक यह सवाल नहीं किया कि सिर्फ़ 72 लोग किस तरह तीस हज़ार के लश्कर का मुक़ाबला करेंगे। उनकी निगाह (दृष्टि) सिर्फ़ ख़ुदा, क़यामत और इमाम-ए-वक़्त की रज़ा (प्रसन्नता) पर मरकूज़ (केन्द्रित) थी, इसीलिए वे आख़िर दम तक साबित-क़दम रहे।

उन्होंने आयतुल्लाहिल उज़मा बुरूजर्दी का नज़रिया नक़्ल करते हुए कहा कि वाक़िया-ए-आशूरा को सिर्फ़ मामूली अक़्ली और मादी पैमाइशों से नहीं समझा जा सकता, बल्कि यह इश्क़-ए-इलाही और इताअत-ए-इमाम (इमाम की आज्ञाकारिता) की ऐसी दास्तान है जो आम हिसाब-किताब से बालातर है।

हुज्जतुल-इस्लाम अंसारियान ने सूरह-ए-अनफ़ाल की इब्तिदाई आयतों की रौशनी में मोमिन-ए-हक़ीक़ी की सिफ़ात बयान करते हुए कहा कि क़ुरआन फ़रमाता है:
«إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذِینَ إِذَا ذُکِرَ اللَّهُ وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ»
सच्चे मोमिन वह हैं जिनके दिल अल्लाह के ज़िक्र से काँप उठते हैं।)

ख़िताब के अंत पर उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन (अ) के अस्हाब उन्हीं क़ुरआनी सिफ़ात का कामिल नमूना थे। उन्होंने आशूरा के दिन अपने ईमान, अख़्लाक़ ईसार और वफ़ादारी के ज़रिए बंदगी-ए-ख़ुदा का ऐसा अज़ीम मुज़ाहरा किया जो रहती दुनिया तक इंसानियत के लिए मशअल-ए-राह रहेगा, और इसी बिना पर शहदा-ए-कर्बला तारीख़ के सबसे बड़े अजायबात में शुमार होते हैं।

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